वॉशिंगटन (सं.सू.)। मिसाइल तकनीक पर कंट्रोल रखने वाले देशों के संगठन मिसाइल टेक्नोलॉजी कंट्रोल रिजीम (एमटीसीआर) में भारत के शामिल होने का रास्ता साफ हो गया। इसे परमाणु आपूर्तिकर्ता समूह (एनएसजी) में भारत के शामिल होने का सेमीफाइनल माना जा रहा है।
अब भारत के एनएसजी में प्रवेश के आसार बढ़ गए हैं। एक राजनयिक के मुताबिक 34 देशों के इस संगठन में भारत की एंट्री पर आपत्ति दर्ज कराने की समयसीमा सोमवार को खत्म हो गई लेकिन किसी ने भी ऐतराज नहीं किया। विश्लेषकों के अनुसार अब भारत के सामने सबसे बड़ी समस्या चीन की ओर से उत्पन्न होने वाली है।
48 सदस्यीय एनएसजी के समूह में भारत को शामिल करने पर अगर अमरीका, स्विट्जरलैंड साथ है तो जापान ने भी खुले समर्थन की बात कही है। जापान ने तो भारत के पक्ष में अन्य देशों से भी समर्थन जुटाने का वादा किया है।
वैसे चीन ने भी अब नरम रुख अपना लिया है। चीन का कहना है कि एनएसजी में भारत को शामिल करने पर आम राय बने और सदस्य देशों के बीच चर्चा हो। एनएसजी में भारतीय आवेदन पर शुरुआती चर्चा 9 जून को विएना में होनी है। उसके बाद सियोल में 24 जून को वोटिंग होगी ।
माना जा रहा है कि एनएसजी में भारत की सदस्यता के रास्ते में चीन सबसे बड़ी रुकावट है। इसकी वजह यह है कि चीन पाकिस्तान को भी इसकी सदस्यता दिलवाना चाहता है।
कहा जा रहा है कि अगर भारत को एनएसजी की सदस्यता मिल गई तो उसके पास वीटो अधिकार आ जाएगा और वह पाकिस्तान को इस ग्रुप की सदस्यता कभी नहीं हासिल करने देगा। यहां एक बात और ध्यान देने लायक है कि पिछली बार जब जॉर्ज बुश ने चीन से फोन पर कहा था कि भारत को अपवाद के रूप में एनएसजी की सदस्यता दे दी जानी चाहिए, तब यह बात चल रही थी कि भारत एनपीटी यानी परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत कर देगा। लेकिन भारत ने अभी तक एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।
वैसे तो चीन सैद्धांतिक रूप से भारत को एनएसजी का सदस्य बनाए जाने का विरोध नहीं करता। उसका कहना है कि किसी भी नए सदस्य को ग्रुप में शामिल करने के लिए एक सर्वमान्य नियम बने। चीन यह भी कह रहा है कि पाकिस्तान को भी एनएसजी का सदस्य बनाया जाना चाहिए।
दिलचस्प तो यह है कि जब भारत ने एनएसजी की सदस्यता के लिए आवेदन किया तो उसी समय पाकिस्तान ने भी यही किया है। सवाल यह है कि अमरीका अगर भारत का समर्थन और पाकिस्तान का विरोध करता है तो चीन उसके रवैये पर सवाल उठा सकता है।
चीन ने भारत की एनएसजी सदस्यता की कोशिश का इस आधार पर विरोध किया है कि उसने अब तक एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। उसके विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा था कि एनपीटी को एक महत्वपूर्ण मापदंड माना गया है। भारत के अलावा, ढेर सारे अन्य देशों ने भी एनएसजी से जुडऩे की जाहिर की है।
ऐसे में सवाल यह है कि क्या तब गैर एनपीटी सदस्य भी एनएसजी के सदस्य बनेंगे? वैसे चीन के विदेश उपमंत्री ने इस बात का खंडन किया कि उनका देश भारत द्वारा एनएसजी का सदस्य बनने के लिए की जा रही कोशिश में टांग अड़ा रहा है और कहा कि चीन 48 राष्ट्रों के इस संगठन के सदस्यों और भारत के साथ मिलकर इसका हल ढूंढने के लिए काम करेगा।
अब भारत के एनएसजी में प्रवेश के आसार बढ़ गए हैं। एक राजनयिक के मुताबिक 34 देशों के इस संगठन में भारत की एंट्री पर आपत्ति दर्ज कराने की समयसीमा सोमवार को खत्म हो गई लेकिन किसी ने भी ऐतराज नहीं किया। विश्लेषकों के अनुसार अब भारत के सामने सबसे बड़ी समस्या चीन की ओर से उत्पन्न होने वाली है।
48 सदस्यीय एनएसजी के समूह में भारत को शामिल करने पर अगर अमरीका, स्विट्जरलैंड साथ है तो जापान ने भी खुले समर्थन की बात कही है। जापान ने तो भारत के पक्ष में अन्य देशों से भी समर्थन जुटाने का वादा किया है।
वैसे चीन ने भी अब नरम रुख अपना लिया है। चीन का कहना है कि एनएसजी में भारत को शामिल करने पर आम राय बने और सदस्य देशों के बीच चर्चा हो। एनएसजी में भारतीय आवेदन पर शुरुआती चर्चा 9 जून को विएना में होनी है। उसके बाद सियोल में 24 जून को वोटिंग होगी ।
माना जा रहा है कि एनएसजी में भारत की सदस्यता के रास्ते में चीन सबसे बड़ी रुकावट है। इसकी वजह यह है कि चीन पाकिस्तान को भी इसकी सदस्यता दिलवाना चाहता है।
कहा जा रहा है कि अगर भारत को एनएसजी की सदस्यता मिल गई तो उसके पास वीटो अधिकार आ जाएगा और वह पाकिस्तान को इस ग्रुप की सदस्यता कभी नहीं हासिल करने देगा। यहां एक बात और ध्यान देने लायक है कि पिछली बार जब जॉर्ज बुश ने चीन से फोन पर कहा था कि भारत को अपवाद के रूप में एनएसजी की सदस्यता दे दी जानी चाहिए, तब यह बात चल रही थी कि भारत एनपीटी यानी परमाणु अप्रसार संधि पर दस्तखत कर देगा। लेकिन भारत ने अभी तक एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं।
वैसे तो चीन सैद्धांतिक रूप से भारत को एनएसजी का सदस्य बनाए जाने का विरोध नहीं करता। उसका कहना है कि किसी भी नए सदस्य को ग्रुप में शामिल करने के लिए एक सर्वमान्य नियम बने। चीन यह भी कह रहा है कि पाकिस्तान को भी एनएसजी का सदस्य बनाया जाना चाहिए।
दिलचस्प तो यह है कि जब भारत ने एनएसजी की सदस्यता के लिए आवेदन किया तो उसी समय पाकिस्तान ने भी यही किया है। सवाल यह है कि अमरीका अगर भारत का समर्थन और पाकिस्तान का विरोध करता है तो चीन उसके रवैये पर सवाल उठा सकता है।
चीन ने भारत की एनएसजी सदस्यता की कोशिश का इस आधार पर विरोध किया है कि उसने अब तक एनपीटी पर हस्ताक्षर नहीं किए हैं। उसके विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता ने कहा था कि एनपीटी को एक महत्वपूर्ण मापदंड माना गया है। भारत के अलावा, ढेर सारे अन्य देशों ने भी एनएसजी से जुडऩे की जाहिर की है।
ऐसे में सवाल यह है कि क्या तब गैर एनपीटी सदस्य भी एनएसजी के सदस्य बनेंगे? वैसे चीन के विदेश उपमंत्री ने इस बात का खंडन किया कि उनका देश भारत द्वारा एनएसजी का सदस्य बनने के लिए की जा रही कोशिश में टांग अड़ा रहा है और कहा कि चीन 48 राष्ट्रों के इस संगठन के सदस्यों और भारत के साथ मिलकर इसका हल ढूंढने के लिए काम करेगा।

No comments:
Post a Comment