नई दिल्ली (सं.सू.)। भारतीय प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी का ब्रिटेन दौरा पाकिस्तानी उर्दू अख़बारों के पहले पन्ने और संपादकीय पन्नों पर छाया रहा।
अख़बार ‘नवाए वक्त’ ने लिखा है कि मोदी के दौरे में भारत और ब्रिटेन ने असैन्य परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। और ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने भारत को अमरीका से भी बड़ा अपना साझीदार बताते हुए उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने का भी समर्थन कर दिया।
अख़बार लिखता है, "नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ प्रदर्शनों और उनकी नीतियों और कदमों की कड़ी आलोचना से अमरीका और ब्रिटेन की आंखें खुल जानी चाहिए मगर ये ताकतें अपने हित साधना चाहती हैं और इसीलिए उन्हें मोदी और उनकी जालिमाना नीतियां सब क़बूल हैं।"
अख़बार लिखता है कि अमरीका जंग में फ्रंट लाइन सहयोगी पाकिस्तान को बताता है लेकिन उसकी नवाजिशें भारत पर होती हैं तो इसके लिए अमरीका से ज़्यादा कसूरवार पाकिस्तानी राजनयिक हैं जो अमरीका को पाकिस्तान की अहमियत का अहसास नहीं करा पाए।
‘एक्सप्रेस’ ने लिखा है कि भारतीय आर्थिक और राजनीतिक विश्लेषक भले ही कितना ढिंढोरा पीटें कि विदेशी निवेश, आर्थिक समझौते, व्यापारिक, शैक्षिक और तकनीक के क्षेत्रों में विस्तार मोदी सरकार के लिए प्लस पॉइंट है लेकिन मानवाधिकार हनन, हिंसा और असहिष्णुता के सवालों के जवाब किसी के पास नहीं हैं।
अख़बार की टिप्पणी है कि भारत को घमंड था कि वो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन आज उसके बहुत से नागरिक व्यक्तिगत आज़ादी के लिए फरियाद कर रहे हैं, ये कैसा लोकतंत्र है?
वहीं ‘दुनिया’ ने छापा है कि नरेंद्र मोदी के लंदन पहुंचने पर हुए विरोध प्रदर्शन में सिर्फ मुसलमान या ईसाई शामिल नहीं थे, बल्कि हिंदू और सिख समेत अन्य समुदायों से लोग भी वहां मौजूद थे।
‘जंग’ ने लिखा है कि भारत में जहां नरेंद्र मोदी ने हिंदू कट्टरपंथियों को नफरत फैलाने की खुली छूट दे रखी है, वहीं पाकिस्तान में नवाज शरीफ ने कराची में दिवाली के समारोह में जाकर धार्मिक सहिष्णुता की मिसाल पेश की है।
अख़बार ‘नवाए वक्त’ ने लिखा है कि मोदी के दौरे में भारत और ब्रिटेन ने असैन्य परमाणु सहयोग समझौते पर हस्ताक्षर किए हैं। और ब्रितानी प्रधानमंत्री डेविड कैमरन ने भारत को अमरीका से भी बड़ा अपना साझीदार बताते हुए उसे संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद का स्थायी सदस्य बनाने का भी समर्थन कर दिया।
अख़बार लिखता है, "नरेंद्र मोदी के ख़िलाफ प्रदर्शनों और उनकी नीतियों और कदमों की कड़ी आलोचना से अमरीका और ब्रिटेन की आंखें खुल जानी चाहिए मगर ये ताकतें अपने हित साधना चाहती हैं और इसीलिए उन्हें मोदी और उनकी जालिमाना नीतियां सब क़बूल हैं।"
अख़बार लिखता है कि अमरीका जंग में फ्रंट लाइन सहयोगी पाकिस्तान को बताता है लेकिन उसकी नवाजिशें भारत पर होती हैं तो इसके लिए अमरीका से ज़्यादा कसूरवार पाकिस्तानी राजनयिक हैं जो अमरीका को पाकिस्तान की अहमियत का अहसास नहीं करा पाए।
‘एक्सप्रेस’ ने लिखा है कि भारतीय आर्थिक और राजनीतिक विश्लेषक भले ही कितना ढिंढोरा पीटें कि विदेशी निवेश, आर्थिक समझौते, व्यापारिक, शैक्षिक और तकनीक के क्षेत्रों में विस्तार मोदी सरकार के लिए प्लस पॉइंट है लेकिन मानवाधिकार हनन, हिंसा और असहिष्णुता के सवालों के जवाब किसी के पास नहीं हैं।
अख़बार की टिप्पणी है कि भारत को घमंड था कि वो दुनिया का सबसे बड़ा लोकतंत्र है, लेकिन आज उसके बहुत से नागरिक व्यक्तिगत आज़ादी के लिए फरियाद कर रहे हैं, ये कैसा लोकतंत्र है?
वहीं ‘दुनिया’ ने छापा है कि नरेंद्र मोदी के लंदन पहुंचने पर हुए विरोध प्रदर्शन में सिर्फ मुसलमान या ईसाई शामिल नहीं थे, बल्कि हिंदू और सिख समेत अन्य समुदायों से लोग भी वहां मौजूद थे।
‘जंग’ ने लिखा है कि भारत में जहां नरेंद्र मोदी ने हिंदू कट्टरपंथियों को नफरत फैलाने की खुली छूट दे रखी है, वहीं पाकिस्तान में नवाज शरीफ ने कराची में दिवाली के समारोह में जाकर धार्मिक सहिष्णुता की मिसाल पेश की है।


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